वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Tuesday, June 21, 2016

कविता संग्रह अमेज़न पर

'शेष अनेक' की जो लेखकीय पाँच प्रतियाँ यहाँ पहुँची वे हवा लगते ही फुर्र हो गईं। अब कविता संग्रह अमेज़न पर उपलब्ध है।
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Wednesday, June 15, 2016

शेष अनेक – मोहन राणा



शेष अनेक  – मोहन राणा 

- गोबिन्द प्रसाद





मोहन राणा अपनी पीढ़ी के उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने आठवें दशक के बाद की कविता के परिदृश्य को अपनी काव्यात्मक उपस्थिति से बहुत कुछ बदल दिया है। यूँ तो काव्य विषय अपनी मूल प्रकृति में वही रहते हैं। फिर भी, काव्य-विषय बहुत कुछ वही होने पर भी कवि अपनी दृष्टि का नया आसव भरकर इनमें एक नई दीप्ति, एक नया आस्वाद भर देता है। हर समर्थ कवि जैसे ही किसी चीज़, वस्तु, दृश्य, मनुष्य, प्रकृति अर्थात गोचर-अगोचर संसार को देखता है तो वह प्रायः बदल जाती है। कहने का अभिप्राय यह कि वह ;  वह नहीं रह जाती कवि के देखने से पूर्व जो वह थी। यही वह काव्य दृष्टि है - इसी को काव्य बोध या काव्य अनुभूति का विधान भी कह सकते हैं। मोहन राणा भी उन कवियों में से हैं जो जिस  चीज़ को अपनी दृष्टि की परिधि में लाते हैं उसे अपने देखने भर से ही वे उन चीज़ों के रंग, रूप, रुख़ और उनका किरदार बदल देते हैं।

चीज़ों का यह चरित्र बदल देना आसान काम नहीं. लेकिन मोहन राणा अपनी कविताओँ में यह काम बहुत सहज  करते दिखाई देते पड़ते हैं।  हालाँकि एक कवि होने के नाते मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि यह काम उतना आसान नहीं है जितना प्रतीत होता है इसके पीछे एक ख़ासे लंबे तज्रबे और मश्क की जद्दो-जेहद छिपी रहती है। इस सहजता  को साधने में उनकी भाषा बहुत साथ देती है , उनकी काव्य संवेदना का।  उन्होंने जो भाषा अपने लिए बनाई है या चुनी है उसकी अपनी एक भूमिका है संवेदन का जगाने की दिशा में। बिम्ब –प्रतीक अथवा मिथक आदि से कविता बनाने के प्रचलित साँचेबद्ध फ़ार्मूले में अपने को बिना बाँधे और बिना  रिड्यूस किए ही वे अपनी संवेदना को मूर्त करते चलते हैं। यह उनकी अनुभूति के नए विधान और तदनुकूल उसे संप्रेषित करने वाले भाषिक-विन्यास और कौशल का ही कमाल है।

मोहन राणा की कविताओं मे सामाजिक सरोकार और जीवन का यथार्थ यांत्रिक रूप से बहुत ठोस नहीं दिखाई पड़ता।  कारण यह कि वे यथार्थ को बहुत सतही और  स्थूल धरातल पर पकड़ने के बजाय उसे उसके भीतरी रूप में पकड़ने का प्रयास करते हैं।  उनकी कविताओं में बयान का तौर-तरीक़ा कुछ ऐसा है कि लगता है यथार्थ की ठोस मोटी चादर के बजाय उनकी काव्य संवेदना सपनीले जल से जैसे झाँकती है। गोचर-अगोचर संसार के स्पंदित रूप, अभाव –आकांक्षाओं से भरी स्मृति-विस्मृतियाँ और मानवीय सह सम्बंधों के तमाम चेहरे वे अपनी इसी अर्जित शैली में आँकते चलते हैं।

शेष अनेक  (कविता संग्रह)
मोहन राणा
© 2016
कॉपर कॉईन पब्लिशिंग 
ISBN 978-93-84109-05-9
 
शेष अनेक ( Shesh Anek)
Poetry collection by Mohan Rana
Publisher
Copper Coin Publishing
© 2016 मोहन राणा
ISBN 978-93-84109-05-9

Copper Coin Publishing

Ramkrishna Nagar
Shegaon 444 203
Buldhana
India

Sales: sales@coppercoin.co.in
Information: info@coppercoin.co.in
 

Tuesday, May 17, 2016

कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन : Launch of Poetry Collection "Shesh Anek"

शेष अनेक (कविता संग्रह), 2016
मोहन राणा
प्रकाशक : कॉपर कॉईन पब्लिशिंग

Shesh Anek ( Poetry Collection), 2016
Mohan Rana
Publisher : Copper Coin Publishing




15 मई 2016 को मुम्बई में प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे द्वारा कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन

Saturday, May 14, 2016

शेष अनेक

मेरे नये कविता संग्रह "शेष अनेक" का 15 मई 2016 को मुम्बई में विमोचन होगा।
इसे कॉपर कॉईन पब्लिशिंग ने प्रकाशित किया है।

Launch of my new poetry collection शेष अनेक [Shesh Anek] in Mumbai on 15th May 2016. This collection is published by Copper Coin Publishing.

शेष अनेक ( कविता संग्रह), 2016

Wednesday, February 24, 2016

है गोल दुनिया गोल

बादल वाले जहाज़ दो तीन दिन से गायब हैं। हवा संतुलित है और पंछी आश्वस्त, कुछ दिन पहले बड़ी तितलियाँ भी मंडराती दिखाई दीं।  खिड़कियों में बंद घर संसार के बाहर।
वसंत घट रहा है बिना कोंपलों के । कई दिनों बाद यकायक चमकती धूप का भरम भी यह हो सकता है। और कुछ दिन में फिर  यथा वात मौसम , पर अभी हम सुखन

अपने दो पैरों पर घूमते
गोल दुनिया गोल

Monday, February 01, 2016

सौ फूलों को खिलने दो

पर फूलदान में किसको लगाएँ
देवालय में किसको चढ़ायें,
बिल्ली के गले कौन बांधेगा डर के घंटी
कोई नाम सोचते हम हँसते रहेंगे दुस्वपन देखते,
इतिहास अपनी चुप्पी में भी करेगा सवाल
चेतावनियों के कान इतने क्यों बहरे


© मोहन राणा
शेष अनेक (कविता संग्रह) 2016