वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Tuesday, April 10, 2018

Missing from language






Torus
Just imagine universe itself; the vibration, the energy and the frequency!
Counting there is a deeper philosophical truth in this if what is missing from language!













 





मैं चुनता कुछ बसेरा पर ठहर  जंगलात के पतरौल बन,
घर ही बन जाय  वहीं होंगे पुरखे भी ऊँचे डांडों को ताकते


  ©2018 Mohan Rana

Saturday, April 07, 2018

अतिरिक्त
















अतिरिक्त

यह जनम किसका कि सुबह हुई
दोपहर और शाम हुई
उसने बताया तुम्हारी उम्र इतनी हुई,
कितनी
कितनी
समा गई एक ही शब्द में
पूछते मैं दैाड़ता रहा उसके पीछे
उठाए एक रिक्त स्थान को
पर उसे कहाँ रखूँ
इस प्रश्नपत्र में


[10.3.2003]

©2018

Thursday, March 22, 2018

कविताएँ मैंने लिखीं

हम कितने उथले थे अपनी भावनाओं में
रुक कर नहीं पूछते  यह चोट कैसी है तुम्हारे माथे
जिसका घाव आइने में देखता हूँ !
पर  कविताएँ मैंने लिखीं 
© 8/12/2017



















© 8/12/2017 Mohan Rana

Wednesday, January 03, 2018

दूर खिड़की पास दिल्ली



दूर खिड़की पास दिल्ली

भाग रहा हूँ पर दूरियाँ बढ़ती चली जाती हैं
6900 किलोमीटर दूर ही रह गई
भाग रहा हूँ नज़दीक जाने कहीं
दूर खिड़की पास दिल्ली
पर गंतव्य छूट रहा पीछे कहीं
जो कल सोचा वह आज नहीं
लपेटता जैसे किसी और तह में ख़ुद को
तस्मों को ढीला करता नंगे पाँव दौड़ते

 [29.11.2008] 

- मोहन राणा



(रेत का पुल /कविता संग्रह : 2012)

Saturday, December 02, 2017

भरोसा































भरोसा


दिनभर बोलता जिद्दी रुरुआ नींद में भी जगा
सांस की जगह ले चुका मन की बातों में
अब मैं बिना फूँक के भी बजता बाजा हूँ
अपने ही शोर में बहरे कानों के भीतर

मैं बताऊँगा उन्हें सपने देखता
मैं उन जैसा नहीं अकेला
पर अलग
रचता उन जैसा ही सहेजता
छुअन भर एक भरोसा

यही पल हमेशा आख़िरी
और इससे पहले ना जिया कभी
जितना मैं पास उतना ही दूर
कोलाहल में उस अकारथ देह रेखा से,
गुमसी मेट्रो में एक हाथ से थामे अपनी स्पर्श निजता
अपने जीवन से असहमत कितनी बार और हर बार भूल जाता
भाग कर याद दिलाते जियी हुई सीख अपने अकेलेपन को
ऐसे ही पल जब मैं पहचानता हूँ
फिर लौटते अपनी इच्छाओं के व्योम
हो जाए पार चौखट पल्ली पार
मन जाने कहाँ लग जाता है यही सोचकर

अतीत पर चलना होता है आसान
मनचाही खुशी और दुख को उसमें भरना,
धीमी आवाज़ में अधूरी कहानियों का निरंतर पाठ है उसका तहखाना
जहाँ रात का पेड़ हरा भरा जिस पर सोई हैं स्मृतियाँ,
जब कभी अँधेरे में भी पहचान लेंगे एक दूसरे को वहाँ
बढ़ाते हाथ गिरते कंधों को थामने,
हर रोज़ मान कर चल पड़ते
आँख खुलने को अपने जीवित होने का प्रमाण,
अपनी सुनाने की बारी आने का
है ना हमें भरोसा 


2009



शेष अनेक ( 2016)  © मोहन राणा


© Mohan Rana
Published by Copper Coin, India. 2016 

https://www.wordsandworldsmagazine.com/archive-1/fall-issue-2016-herbst-ausgabe-2016/mohan-rana/


Monday, November 27, 2017

सुनता है गुरू ज्ञानी



सुनता है गुरू ज्ञानी - कबीर