अर्थ शब्दों में नहीं तुम्हारे भीतर है । Meaning is not in the words but Inside You

अर्थ शब्दों में नहीं तुम्हारे भीतर है ।  Meaning is not in the words but Inside You

Tuesday, June 23, 2015

होगा एक और शब्द



नीली रंगतें बदलतीं
आकाश और लहरों की
बादल गुनगुनाता कुछ
सपना सा खुली आँखों का
कैसा होगा यह दिन
कैसा होगा
यह वस्त्र क्षणों का
ऊन के धागों का गोला
समय को बुनता
उनींदे पत्थरों को थपकाता
होगा एक और शब्द
कहने को
यह किसी और दिन

[पत्थर हो जाएगी नदी (2007)]
Translation in English : "Another Word for It"
http://www.poetrytranslation.org/poems/another-word-for-it

Friday, June 12, 2015

दिलवाया उर्फ हटवाया

क्या हिन्दुस्तानी संस्कृति में केवल अयोग्य ही वरीयता की योग्यता है !
मेरा मंतव्य केवल  हिन्दी में कविता लिखने वाले सरोकारी खयाल गायकों से नहीं है. अन्य कला विधाओं व संकायों में भी यह खरपतवार दृष्टिकोण जमा हुआ है.
कविता के एक संदर्भ में यह 'दिल + वाया' शब्द
उत्तर भारत में यूँ प्रयोग होता है जैसे वहाँ कवि आसव रस पीते हुए या कहीं टहलते, यकायक गुनगुनाते या जेब में कुछ टटोलते  - दूसरे कवियों को दौ कौड़ी का बताते रहते हैं .
ये हिम्मतदार सुधिजन कभी  ' हट + वाया' शब्द का प्रयोग खुले आम करते ना दिखते हैं ना सुनाई पड़ते हैं. 

Thursday, June 11, 2015

दो कविताएँ- एक जिल्द


दो कविताएँ- एक जिल्द

रेत का पुल: मोहन राणा

रेत का पुल

कविता संग्रह
प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एकसटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.)
मूल्य: 200 रुपये.




लॉर्ड मैकाले का तंबू

मैं वर्नेकुलर भाषा में कविता लिखता हूँ
आपको यह बात अजीब नहीं लगती
मैं कंपनी के देश में वर्नेकुलर भाषा में कविता लिखता हूँ,

मतलब कागज पर नाम है देखें
मिटे हुए शब्दों में धुँधली हो चुकी आँखें
ढिबरी से रोशन गीली दोपहरों में,
कबीर कहे माया महाठगनि हम जानी,
और सहमति से झुका केवल कर सकता हूँ अपने आप से बात
छूट गई बोली को याद करते पहले खुद को अनसुना
कि भाखा महाठगनि हम जानी

कोई नहीं संदर्भ के लिए रख लें इस बात को कहीं
आगे कभी जब दिखें लोग आँखें बंद किये
तो पार करा दीजियेगा उन्हें रास्ता कहीं कुछ लिख कर,
मैं भी भूल गया था इसे कहीं रख
कुछ और खोजते आज ही मुझे याद आया
भाग रहा था अपने ही जवाबों के झूठ से
कहता मैं सच की तलाश में हूँ
अपने बगीचे में बाँध रखीं हैं मैंने घंटियाँ पेड़ों से,
एकाएक जाग उठता हूँ उनकी आवाजें रात सुनकर
कहीं वे गुम ना हो जाएँ
मेरे वर्नेकुलर शब्दों की तरह
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पानी का रंग
(जेन के लिये)

यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से
जैसे वह धो रही हो हमारे दागों को जो छूटते ही नहीं
बस बदरंग होते जा रहे हैं कमीज़ पर
जिसे पहनते हुए कई मौसम गुज़र चुके
जिनकी स्मृतियाँ भी मिट चुकी हैं दीवारों से

कि ना यह गरमी का मौसम
ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन
कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ,

शायद कोई रंग ही ना बचे किसी सदी में इतनी बारिश के बाद
यह कमीज़ तब पानी के रंग की होगी !
 

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   को आभार इन कविताओं को प्रकाशित करने के लिए
http://raviwar.com/footfive/f74_ret-ka-pul-by-mohan-rana-book.shtml

Sunday, May 31, 2015

जो हुआ खुश

धरती आसमा बीच चहुँ दिशा के दायरे _ कोई
कोई तो
जिसने सुनी आहट दरवाजे
आया ध्यान कहीं कुछ सोचते ठिठक 
जो हुआ खुश,
अपने दूर के पास देस
तुम्हारी वापसी और मेरे लौट जाने पर

 © मोहन राणा

Sunday, May 03, 2015

बम भरम अगड़ बगड़

Illusions का भी अपना मजा है ।
यहाँ शहर में एक आदमी अपने खोखे में जादू के खेल बेचता है अक्सर मैंने देखा है किसी गुजरते चमकृत ग्राहक को पकड़ने के लिए वो एक ट्रिक खेलता रहता है, दस पाउंड के नोट के बीच पेन ठूंस कर निकालना,  पेन नोट के आर पार हो जाता है पर पेन वापस खींचते ही, नोट बिल्कुल खरी हालत में, कोई छेद नहीं!
शायद मन की तरंगों में भी ईमेल प्रसारित होती रहती हैं। इलैक्ट्रान्स का चक्रम,  पता ही नहीं चलता, बम भरम अगड़ बगड़ और
विचार कब विचार बन जाते हैं मन के डिब्बे में ।


सदा पानी में पानी
जिसमें मिला वो हो गया पानी 
चिर बंधन जो मिला वो बन गया
बादलोें को सपना लपक सतह पर एक बुलबुला खींच
गोता उन गहराईयों में  कोई किनारा छू 
 मन मीन प्यासी इस आस में
घिरेगा  आकाश उन प्रदेशों में कभी जहाँ हवा भी डरती है दिन दुपहरी,
लिखा अलिखा रह जाता अपढ़ा
यही सुनते
जाग मच्छंदर गोरख आया
अलख अलख बोल जग भरमाया

© मोहन राणा 

Tuesday, March 17, 2015

नक्शे में रेखा

जो छूटा वो अब दूर ,
जो पास आता वो भी बहुत दूर
फिलहाल अपने दिन रात को बदलना होगा
कुर्सी को झुका नींद की करवट में  गर हो सके तो,
दो देशांतरों के बीच सीमा पार करते जहाज  मीटर और फीट ऊँचाई बताता
खिसकता है नक्शे में रेखा पर

मैंने देखा वह
जिया वह
कि कह सकूँ चुप रह

गरमियाँ आयेंगी, पर तपती दोपहर चलती गरम हवा की  होती है अपनी उदासी
सरसर पीपल के झोंको  में बची छाया तल बैठे,
कि कभी लगता एक चमक टूट कर गिरेगी मुझ पर आकाश से



© मोहन राणा 

Thursday, January 29, 2015

सदस्यता

हर रोज अपनी बेशर्मी में नहाने के बाद भी
धुलती नहीं कायरता उनकी त्वचा से
उनकी ख्याति भी नहीं छुपा पाती उसकी गंध,
जानकर एक नजर पहचान जैसे पुरानी एक स्लाइड
उन्हें याद आया
बोल पड़ते वे प्रशंसा का कोई शब्द
देते कोई रसीदी भूल चूक लेनी देनी निमंत्रण,
लेखक प्रजाति की सदस्यता
अगली बार  बताइयेगा दिल्ली  आने से पहले
कहीं एक कार्यक्रम रख लेंगे,
इस बार भी मैं बिना बताये चला आया
यह जगह मेरा घर है
पर उनके लिए एक पता






© 23.6.2008