वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Wednesday, November 30, 2016

लुबलियाना में कविता पाठ । Poetry Reading in Ljubljana

I spent almost a week  in Slovenia with very talanted and creative poets, Stanka Hrastelj, Ricardo Domeneck and Azita Ghahreman writing in their own language at the moment in Europe.
After translating each other's poetry for almost a week in an intense & a rewarding translation workshop at Škocjan.
A reading of translated poems was given in Hindi, Persian, Portuguese and Slovenian in the Book fair at Tržaška Cesta, Ljubljana, Slovenia on 25th November 2016.

कविता पाठ । Poetry Reading


Published on 17 Jul 2016
The indian poet Mohan Rana (Delhi, 1964) reads some poems and talks about his poetry in this video, recorded in Zaragoza (Spain). Rana visited Spain in March 2016 for a poetry reading in Antígona bookshop (Zaragoza) and in Voces del Extremo poetry festival (Logroño).

Poems translated from Hindi by Lucy Rosenstein and Bernard O'Donoghue. Video by David Francisco.

More info about Mohan Rana in https://en.wikipedia.org/wiki/Mohan_Rana

Video by David Francisco
 

Thursday, October 20, 2016

ग्दांस्क , पोलैंड में कविता । A poem in Gdansk, Poland

ग्दांस्क , पोलैंड में कविता

[पारगमन]

मैं अतीत था फिर भी मैं सबको भूल जाऊँगा
मैं सब सुन लेता हूँ अब, मैं अनहद हो गया हूँ........

The Crossing

I'll forget all, even though I was the past

I hear all now, I have become the Primal Sound...


Przejście

Zapomnę wszystko, choć byłem przeszłością.
Teraz słyszę wszystko, stałem się Pradzwiękiem.
Sięgam wzrokiem daleko, stałem się horyzontem.
Choć oddaliłem się od wszystkiego,
nadal tak bliski aż niewidoczny; teraz jestem jednym w twoim oddechu.
Kukło z gliny, stałem się ziemią.

© Mohan Rana 2016

'Jo Quail with Cappella Gedanensis'

Sunday 23rd October,Gdansk, Poland

featuring poetry of Mohan_Rana, plus tracks from all albums!




Thursday, October 06, 2016

नई कविताएँ - मोहन राणा । New Poems - Mohan Rana

Three New Poems in Translation.


These three poems were translated from Hindi by Lucy Rosenstein and the Irish poet Bernard O’Donoghue.

खग्रास

हमने की कोशिश अँधेरे को मिटाने की
हो गए मंत्रमुग्ध चमकते बल्बों की चौंधियाहट से
कि नहीं दिखता कुछ भी उस चमकते अँधेरे में...

From 'Eclipse':

'Trying to overcome the dark,
we become dazzled by shining bulbs.
Nothing is visible in this glowing darkness,'

नक़्शानवीस

पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो
तुम एक ख़ामोश पहचान
जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश,
तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में...

From 'The Cartographer':

'Between the lines it’s you,
absent, but a silent presence
just as the rain is absent in the passing clouds.'

बावली धुन

रात थी सुबह हो गई
करवटों में भी नहीं मिली कोई जगह
यह ग़लत पतों की यात्रा है मेरे दोस्त...

From 'An Obsessive Tune':

'Night passed and the morning came,
though, tossing and turning, I got nowhere.
A journey, dear friend, to wrong places.'

कविताएँ -  POEMS
http://www.poetrytranslation.org/news/new-poems-by-mohan-rana





Saturday, September 24, 2016

'तीसरा पहर' कविता का नेपाली अनुवाद । Translation of poem 'Teesara Pahar' [After Midnight] in Nepali

तेस्रो प्रहर

- मोहन राणा

धेरै टाढा मैले ताराहरुलाई देखेँ
जति टाढा म
तीनले देखे यस पलमा
टिमटिमाउँदो अतितको पल
अध्यारोको असीमतामा
विहानलाई पच्छ्याउँदै रातमा
यो तेस्रो प्रहर

म निर्णय गर्न सकिरहेको छैन
के म बाँचिरहेको छु जीवन पहिलोपटक
अथवा यसलाई बिर्सेर बाँचेको कुरा दोहर्याउँदै जाँदैछु
सासको पहिलो पललाई नै सधैँ ।

के माछाले पनि पानी पिउँदछ होला
वा सूर्यलाई पनि लाग्दछ गर्मी
के उज्यालोले पनि कहिले काहीँ देख्दछ होला अंधकार
के वर्षा पनि सँधै भिजिरहन्छ होला
के म जस्तै सपनाले पनि प्रश्न सोध्दछ होला निद्राको बारेमा

टाढा टाढा धेरै टाढा पुगेको छु म
जब मैले ताराहरुलाई देखेँ धेरै नजिक
आज पानी परिरह्यो दिनभर
अनि शब्दहरु पखालिए तिम्रो अनुहारबाट ।

[हिन्दी से नेपाली अनुवादः कृष्ण बजगाईं]

( मूल हिन्दी में कविता)

तीसरा पहर

मैंने तारों को देखा बहुत दूर
जितना मैं उनसे
वे दिखे इस पल में
टिमटिमाते अतीत के पल
अँधेरे की असीमता में,
सुबह का पीछा करती रात में
यह तीसरा पहर

और मैं तय नहीं कर पाता
क्या मैं जी रहा हूँ जीवन पहली बार,
या इसे भूलकर जीते हुए दोहराए जा रहा हूँ
सांस के पहले ही पल को हमेशा

क्या मछली भी पानी पीती होगी
या सूरज को भी लगती होगी गरमी
क्या रोशनी को भी कभी दिखता होगा अंधकार
क्या बारिश भी हमेशा भीग जाती होगी,
मेरी तरह क्या सपने भी करते होंगे सवाल नींद के बारे में

दूर दूर बहुत दूर चला आया मैं
जब मैंने देखा तारों को - देखा बहुत पास,
आज बारिश होती रही दिनभर
और शब्द धुलते रहे तुम्हारे चेहरे से


(रेत का पुल, 2012)



{English Translation}


After Midnight

I saw the stars far off -
as far as I from them:
in this moment I saw them -
in moments of the twinkling past.
In the boundless depths of darkness,
these hours
hunt the morning through the night.

And I can't make up my mind:
am I living this life for the first time?
Or repeating it, forgetting as I live
the first moment of breath every time?

Does the fish too drink water?
Does the sun feel the heat?
Does the light see the dark?
Does the rain too get wet?
Do dreams ask questions about sleep as I do?

I walked a long, long way
and when I saw, I saw the stars close by.
Today it rained all day long and the words were washed away
from your face.
[Translation from Hindi by Lucy Rosenstein & Bernard O’Donoghue]


 

पॉडकास्ट : मोहन राणा की 12 हिन्दी कविताएँ । Podcast: 12 Hindi poems by Mohan Rana.

Listen to a playlist of 12 Hindi poems by Mohan Rana. The poems are read first in English translation by Bernard O'Donoghue and then in Hindi by Mohan himself.
https://soundcloud.com/poetrytranslationcentre/sets/mohan-rana-1

Thursday, September 15, 2016

'शेष अनेक' कविता संग्रह की समीक्षा। A celebration of elemental muse.

निसर्ग प्रेरणांचा उत्सव। A celebration of elemental muse.
'शेष अनेक' की दा.गो.काळे. द्वारा लिखित समीक्षा 'वाटसरू' [1 से 15 सितम्बर 2016 ] अंक में।
Review of 'Shesh Anek' in Watsaru Magazine ( 1-15 sept 2016)
by Damodar Kale.


Thursday, September 01, 2016

मूल हिन्दी से कविता का जर्मन अनुवाद। A poem with German translation.

अंतराल

समय यहाँ क़दम नहीं उठाता
हम घूमते हैं उसके पाँवों पर 
नींद में सावधानी से चलना यह सोता नहीं है
न तो यह तुम्हारी और मेरी तरह कहीं आता जाता है 
पर हम कई बार आ कर गुज़र गए
अपनी परछाई के आगे पीछे 
यह ले रहा है साँस, यह जी रहा है हमारी साँसों पर
यह कभी मुस्कराता भी है
हम इसे भूल जाते हैं अतीत कह कर
पर इसे याद है भविष्य भी।

̶ मोहन राणा (*1964 , दिल्ली)
कविता 2010 में लिखी गई और 'शेष अनेक' 2016 में प्रकाशित, पृष्ठ 75

Zwischenzeit

Die Zeit erhebt ihren Schritt hier nicht
Wir umkreisen ihre Füße
Geh vorsichtig im Schlaf
Denn er ist keine heilende Quelle
Die Zeit läuft und kehrt nicht zurück
Wie Du und Ich
Aber wir, die Menschen, verlassen sogar
Den Schatten unseres eigenen Körpers
Nach vorn und nach hinten
Und umkreisen ihn immer wieder
Die Zeit atmet, sie lebt von unserem Atem
Und manchmal lacht sie auch
Wir nennen sie Vergangenheit
Und vergessen sie
Aber die Zeit weist sogar die Zukunft.
 


- Mohan Rana (*1964, Delhi)
Poem written in 2010 &  published in ‘Shesh Anek’ 2016, page 75.

Translation from Hindi to German : Ram Prasad Bhatt 


शेष अनेक (कविता संग्रह)
प्रकाशक -
कॉपर कॉइन पब्लिशिंग प्रा. लि.
ISBN 978-93-84109-05-9


Saturday, July 30, 2016

लंदन में कविता पाठ । Poetry reading in London

'शेष अनेक ' से कुछ कविताओं  का पाठ। Reading some poems from '. Shesh Anek'

[प्रकाशक - कॉपर कॉईन /Publisher - Copper Coin]

THE INTERNATIONAL HOT SUMMER SHUFFLE
Saturday 30 July 2016, 7:30 pm – 9:30 pm

Booking information.

Entry £6/4

Venue

The Poetry Café
  22 Betterton Street
  London, WC2H 9BX United Kingdom

http://poetrysociety.org.uk/event/the-international-hot-summer-shuffle/