वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Tuesday, May 17, 2016

कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन : Launch of Poetry Collection "Shesh Anek"

शेष अनेक (कविता संग्रह), 2016
मोहन राणा
प्रकाशक : कॉपर कॉईन पब्लिशिंग

Shesh Anek ( Poetry Collection), 2016
Mohan Rana
Publisher : Copper Coin Publishing




15 मई 2016 को मुम्बई में प्रसिद्ध कवि विष्णु खरे द्वारा कविता संग्रह 'शेष अनेक' का विमोचन

Saturday, May 14, 2016

शेष अनेक

मेरे नये कविता संग्रह "शेष अनेक" का 15 मई 2016 को मुम्बई में विमोचन होगा।
इसे कॉपर कॉईन पब्लिशिंग ने प्रकाशित किया है।

Launch of my new poetry collection शेष अनेक [Shesh Anek] in Mumbai on 15th May 2016. This collection is published by Copper Coin Publishing.

शेष अनेक ( कविता संग्रह), 2016

Wednesday, February 24, 2016

है गोल दुनिया गोल

बादल वाले जहाज़ दो तीन दिन से गायब हैं। हवा संतुलित है और पंछी आश्वस्त, कुछ दिन पहले बड़ी तितलियाँ भी मंडराती दिखाई दीं।  खिड़कियों में बंद घर संसार के बाहर।
वसंत घट रहा है बिना कोंपलों के । कई दिनों बाद यकायक चमकती धूप का भरम भी यह हो सकता है। और कुछ दिन में फिर  यथा वात मौसम , पर अभी हम सुखन

अपने दो पैरों पर घूमते
गोल दुनिया गोल

Monday, February 01, 2016

सौ फूलों को खिलने दो

पर फूलदान में किसको लगाएँ
देवालय में किसको चढ़ायें,
बिल्ली के गले कौन बांधेगा डर के घंटी
कोई नाम सोचते हम हँसते रहेंगे दुस्वपन देखते,
इतिहास अपनी चुप्पी में भी करेगा सवाल
चेतावनियों के कान इतने क्यों बहरे


© मोहन राणा
शेष अनेक (कविता संग्रह) 2016

Saturday, December 12, 2015

तभी तो


इतने महीन दिन महीन बातों में
कि सच भी पारदर्शी हो गया,
झूठ पर अब शक नहीं होता
सुबह आइना देखते ही दुनिया से शाया करते हुए,
अब संतोष होता है।

समय कम है लोग कम हैं पर कहानियाँ कई 
सुनकर अधसुनी लिख अधूरी कि घट चुके भविष्य को आँखें नहीं देख पातीं हाशियों में पढ़ते,
जो सुनाकर भी  नहीं होती पूरी
उनके और मेरे दिनों का याद किया जमा जोड़ में भी
जो ख़ुद ब ख़ुद घटता रहता है रेत के पहाड़ में अपने कदमों को रोंदते,
सड़क का दूसरा किनारा रह जाता है जीवन में उस पार ही।


© मोहन राणा
14.12.2015

Sunday, November 29, 2015

नक़्शानवीस

The Cartographer, “As geography changes its borders, fear is my sole companion”.
                                                                  

पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो
तुम एक खामोश पहचान
जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश,
तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में
समय के अंतराल में
इन आतंकित गलियों में,
मैं देखता नहीं किसी खिड़की की ओर
रुकता नहीं किसी दरवाजे़ के सामने,
देखता नहीं घड़ी को
सुनता नहीं किसी पुकार को,
बदलती हुई सीमाओं  के भूगोल में
मेरा भय ही मेरे साथ है


2010

The Cartographer

Between the lines it’s you,
absent, but a silent presence
just as the rain is absent in the passing clouds.
There you are, absent, in every empty space
of life. In every gap of time
on these panic-stricken roads.
I don’t look out any window,
I don’t stop at any door
I don’t watch the clock
I hear noone’s call.
As geography changes its borders,
fear is my sole companion. 


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 "Poems" by Mohan Rana
Translated from Hindi by Bernard O'Donoghue, Lucy Rosenstein (ISBN: 9780956057655)  2011
Poetry Translation Centre, London. 

The Cartographer, “As geography changes its borders, fear is my sole companion”.

The Cartographer heb gezegd:
“Wanneer de geografie haar grenzen wijzigt, is angst mijn enige metgezel”

© Mohan Rana