वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Monday, December 17, 2012

Ret ka Pul /poetry collection/ Mohan Rana

Mohan Rana's poetry is always tuned to sounds from near and afar. At the same time it captures in its images the essence of close and distant sights. In his poetry memories too play an important role. Weaving together all of these, it connects us with experiences which are very rare. They expand our vision and their subtle connections hand us some invisible strings of perception. Passing through these experiences is pleasant, yet often the questions and the sting of pain present in them provoke us to appraise reality anew. Reading his poetry acquaints us with the intimate side of daily life in a new way. At the same time, it takes us along at the speed of lightning and makes us travel through new dimensions of everyday social and family life. Written in accomplished language, his poetry attracts us also with its natural charm.
These qualities are abundantly present in Mohan Rana’s new collection. Moreover, it is notable that in it he has also invented a new poetic language for himself. These poems have a new cadence. Urdu poetic forms have been included and this naturally reminds us of the poetic range of a lyricist like Shamsher.
These poems have wide concerns. They are not only restless in their search for life-values in a changed global world; there is also a dreaminess about them. They enter the deepest folds of the psyche in a new manner, and at the same time look at the happenings in the outside world with a piercing gaze; world which is flooded with scraps of language yet language itself has to overcome this deluge to regain its pure form. This collection has made the terrain of Mohan Rana's poetry more fertile and given Hindi poetry itself a personal expression which will attract the attention of many.

Prayag Shukla 18/7/12

Book Details
Publisher Antika Prakashan
Publication Year 2012
ISBN-13 9789381923221
ISBN-10 9381923221
Language Hindi
Binding Hardcover
Number of Pages     96 Pages


Saturday, August 11, 2012

नया कविता संग्रह / New Poetry Collection

रेत का पुल
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मोहन राणा की कविता हमेशा से दूर-पास की आहटों को एक-साथ सुनती-गुनती रही है। साथ ही पास दूर के दृश्यों के मर्म को अपनी ही तरह के बिंबों में रचती रही है। और उनकी कविता में स्मृतियों की भी एक अहम भूमिका है। नतीजतन ये सारी चीज़ें परस्पर गुंथ कर हमें कई ऐसे अनुभवों से जोड़ती हैं, जो प्राय: अलभ्य  से होते हैं। वे दृष्टि का कुछ विस्तार करते हैं, और उनके सूक्ष्म-जोड़ हमें कई अदेखे संवेदन-सूत्र थमाते हैं। इन अनुभवों से गुजरना प्रीतिकर होता है, और कई बार उनमें विन्यस्त, चुभन और प्रश्न, हमें वस्तु-स्थिति के एक नये आकलन के लिए उकसाते हैं। कुल मिलाकर यह कि उनकी कविताओं का पाठ हमें दैनंदिन जीवन-प्रसंगों के आत्मीय रूप से एक नये प्रकार से परिचित कराता है, साथ ही अपनी विद्युत गति उड़ानों से सुदूर ले जाकर हमारे 'दैनंदिन सामाजिक परिवारिक जीवन को कुछ नये आयामों की यात्रा कराता है। एक सधी हुई भाषा में, उनकी कविता अपनी प्रकृति रमणीयता में भी हमें आकर्षित करती है। इस संग्रह में भी उनके ये गुण भरपूर उपस्थित हैं। पर उल्लेखनीय है कि इसमें उन्होंने अपने लिये एक नयी काव्य भाषा ईजाद की है। ये कविताएँ एक नई लय लिये हुए हैं। इनमें उर्दू कविता की भी काव्यक विधियों का एक समावेश है और ये सहज ही हमें शमशेर जैसे कवि के काव्य परिसर की भी कुछ याद दिलाती हैं।
इनकी चिंताएँ भी अधिक व्यापक हैं। एक बदली हुई 'ग्लोबल दुनिया में ये जीवन-मूल्यों' की तलाश में केवल बेचैन सी हैं, इनमें एक नई 'स्वप्नशीलता भी है। अंतर्मन के तहखानों में ये एक नए अंदाज में प्रवेश करती हैं, साथ ही बाहरी संसार की गतिविधियों को एक अधिक बेधक दृष्टि से देखती हैं, जहाँ 'भाषा के छिलकों की एक बाढ़ सी है पार पाना भाषा को है। उसके खरे रूप में। इस संग्रह से मोहन राणा की कविता-भूमि संपन्नतर हुई है और स्वयं हिंदी कविता को भी इससे एक ऐसा अंदाजे बयाँ मिला है, जिसकी ओर बहुतों का ध्यान जाएगा। 
प्रयाग शुक्ल
 
 
प्रकाशक-
अंतिका प्रकाशन 
http://www.antikaprakashan.com/p/blog-page_13.html

Monday, July 09, 2012

खाकरोबी



गीले बगीचे का खाकरोब
धूल को ढूँढता हूँ  बांझ हरियाली में
पतझर को समेटते
मेरे बोरे में बंद में पिछले वसंत के टूटे सपने...

© मोहन राणा
9.7.12

Sunday, July 08, 2012

Review of ' Poems' in Poetry London, spring issue


Self-consciousness or Simple Ceremony
Declan Ryan on pamphlets and shorter small press collections  in Poetry London, Spring 2012.


POEMS
(Dual-language chapbook)

Mohan Rana

Translated by Bernard O'Donoghue and Lucy Rosenstein
Published by
The Poetry Translation Centre, London
Price £4 plus postage and packing.


 




Thursday, May 10, 2012

कुछ और कविताओं के अनुवाद / Some more poems in translations

Selection of Poems translated from Hindi by Bernard O'Donoghue, Lucy Rosenstein and  Arup K Chatterjee



Coldnoon: Travel Poetics, Spring 2012

by Arup K. Chatterjee (Ed.)

IN STOCK

Available in 2 - 4 weeks
List Price: INR 190.0

is out at

http://dogearsetc.com/book_details.jsp?resourceID=35557

Ed. Arup K Chatterjee
Asst. Ed. Amrita Ajay

Writers -

Brian Wrixon
Amit Ranjan
Arunima Sen
Veronica Pamoukaghlian
Vishesh Unni Raghunathan
Mohan Rana
Manash Bhattacharjee
Murissa Shalapata
C. S. Bhagya
Arup K. Chatterjee

Photographs by:

Dwaipayan Ghosh (Cover)
Arup K. Chatterjee (Inside)
dogearsetc.com
Marketplace for used and hard-to-find books

Saturday, March 17, 2012

पनकौआ


कुछ दिनों में आएगा एक मौसम
इस अक्षांश में अगर वसंत हुआ
मैं कपड़ों को बदलूँगा
आस पास के नक़्शे देखूँगा टहलने के लिए
पेड़ों पर कोंपले आएँगी
बची हुई चिड़ियाएँ लौटेंगी दूर पास से,
आशा बनी है ऐलान ना होगा खबरों में
किसी नई लड़ाई का
खंखारूँगा गला पूरा कहने अधूरा कि चुप हो जाउँगा
लंबा हो इतना इस बार मौसम कि यादें जल्दी ना लौटें
पतझर की, शब्दों के एकांत में

#

छोटा होता जा रहा वसंत हर साल
छोटा हो रहा है हर साल वसंत में,
कभी लगता शायद दो ही मौसम हों अब से
दो जैसे
अच्छा बुरा
सुख दुख
प्रेम और भय
तुम और मैं
जिनमें बंट जाएँ पतझर और वसंत और होती रहे सूखती बारिश साल भर

#

यूँ ही सोचा लिखा जाना रसोई से आती किसी स्वाद की गंध
अपनी आस्तीन में पाकर
नीरव पिछवाड़े में कुछ बूझने की चाह में
एक छोटी सी जगह में कोई तिल भर कुनिया खोजता
तो कुछ दिनों में आए केवल एक समय
दुनिया को बाँटने
जिसे याद रखने के लिए भूलना पड़ेगा सब कुछ


जरूरी सामान की पर्चियों के साथ अकेले,
जीने के लिए केवल सांस ही नहीं
प्रेम की आँच मन के सायों में
हाथ जो गिरते हुए थाम लेता

#

रोज़ की रेज़गारी गिनतारा में जमा बेगार के उधारों को जोड़ते
जर्जर समकाल में घबराए सूखे गालों को टटोलते
नहीं देखा मैंने अब तक इस व्यतीत को,
आइने के भीतर से
जब लगाता हूँ मैं छलांग उसके उजले अनजान में
कुछ पाने कुछ खोकर.

Friday, March 02, 2012

Water it with love/An exhibition of paintings

http://riegaloconamor.blogspot.com/



Riegalo con Amor (water it with love)

Con traducciones visuales de poemas
(Visual translations of poems) de Mohan Rana.


An exhibition of Paintings by
Nereida Jimenez Fuertes
21st Feb - 9th March 2012
I.E.S. Jerónimo Zurita
Zaragoza, Spain

Thursday, February 16, 2012
















भरोसा होता है तुम्हारी आँखो में अपनी पहचान देख हर सुबह
दाना चुगती रॉबिन रुकती सावधान
खिड़की पर फिर वही आदमी कुछ देखता!

©

Monday, February 13, 2012

पहला विश्व रेडियो दिवस - 13 फरवरी 2012 / The first World Radio Day 13 February 2012







फिलिप्स का रेडियो


उस पर विविध भारती और समाचार सुनते घर पुराना हो गया

उसके साथ ही ऊँची नीची आवाज़ें कमजोर तरंगें

उसके नॉब भी खो गये पिछली सफेदी में

धूप में गरमाये सेल रात के अँधेरे में एकाएक चुप हो जाते हैं

समाचारों के बीच ,

आंइडहोवन* की खुली सड़कों में तेज हवा से बचते शहर के बीच

खड़ी विशाल फिलिप्स कॉर्पोऱेशन की इमारत को देखता,

जेब्राक्रासिंग पे खड़ा सोचता,

क्या यह फिलिप्स रेडियो है !


©

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* हॉलैंड में एक शहर

© मोहन राणा

कविता संग्रह "इस छोर पर "(2003) में संग्रहित

वाणी प्रकाशन, दिल्ली


poem :

Philips Radio / Mohan Rana


Philips Radio

My home grew wizened on its Vivid Bharati

Its highs and lows, the fluctuating waves

Its knob has forsaken us in our last whitewash

Cells heated in the sun turn silent by nightfall

In between the headlines

Cowering from the rough wind in the open streets, at the heart of Eindhoven

I stand near a large building of Philips Corporation

I walk the zebra-crossing ponderingly

Is it our Philips Radio?



Translation from Hindi : Arup K Chatterjee



Friday, January 27, 2012

नीलाकाश















बारिश हो रही है कहते ही
रुक जाती एक वाक्य जितनी लंबी,
अपने ही अनुभव पर होने लगता है अविश्वास
चमकते नीलाकाश को देख


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