वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Thursday, February 16, 2012
















भरोसा होता है तुम्हारी आँखो में अपनी पहचान देख हर सुबह
दाना चुगती रॉबिन रुकती सावधान
खिड़की पर फिर वही आदमी कुछ देखता!

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Monday, February 13, 2012

पहला विश्व रेडियो दिवस - 13 फरवरी 2012 / The first World Radio Day 13 February 2012







फिलिप्स का रेडियो


उस पर विविध भारती और समाचार सुनते घर पुराना हो गया

उसके साथ ही ऊँची नीची आवाज़ें कमजोर तरंगें

उसके नॉब भी खो गये पिछली सफेदी में

धूप में गरमाये सेल रात के अँधेरे में एकाएक चुप हो जाते हैं

समाचारों के बीच ,

आंइडहोवन* की खुली सड़कों में तेज हवा से बचते शहर के बीच

खड़ी विशाल फिलिप्स कॉर्पोऱेशन की इमारत को देखता,

जेब्राक्रासिंग पे खड़ा सोचता,

क्या यह फिलिप्स रेडियो है !


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* हॉलैंड में एक शहर

© मोहन राणा

कविता संग्रह "इस छोर पर "(2003) में संग्रहित

वाणी प्रकाशन, दिल्ली


poem :

Philips Radio / Mohan Rana


Philips Radio

My home grew wizened on its Vivid Bharati

Its highs and lows, the fluctuating waves

Its knob has forsaken us in our last whitewash

Cells heated in the sun turn silent by nightfall

In between the headlines

Cowering from the rough wind in the open streets, at the heart of Eindhoven

I stand near a large building of Philips Corporation

I walk the zebra-crossing ponderingly

Is it our Philips Radio?



Translation from Hindi : Arup K Chatterjee