वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Thursday, October 06, 2016

नई कविताएँ - मोहन राणा । New Poems - Mohan Rana

Three New Poems in Translation.


These three poems were translated from Hindi by Lucy Rosenstein and the Irish poet Bernard O’Donoghue.

खग्रास

हमने की कोशिश अँधेरे को मिटाने की
हो गए मंत्रमुग्ध चमकते बल्बों की चौंधियाहट से
कि नहीं दिखता कुछ भी उस चमकते अँधेरे में...

From 'Eclipse':

'Trying to overcome the dark,
we become dazzled by shining bulbs.
Nothing is visible in this glowing darkness,'

नक़्शानवीस

पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो
तुम एक ख़ामोश पहचान
जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश,
तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में...

From 'The Cartographer':

'Between the lines it’s you,
absent, but a silent presence
just as the rain is absent in the passing clouds.'

बावली धुन

रात थी सुबह हो गई
करवटों में भी नहीं मिली कोई जगह
यह ग़लत पतों की यात्रा है मेरे दोस्त...

From 'An Obsessive Tune':

'Night passed and the morning came,
though, tossing and turning, I got nowhere.
A journey, dear friend, to wrong places.'

कविताएँ -  POEMS
http://www.poetrytranslation.org/news/new-poems-by-mohan-rana